आज स्वतंत्रता कि ६३वीं सालगिरह का जश्न बहुत ही धूमधाम से मनाया जा रहा है।विगत संध्या पर राष्ट्रपति और थोड़ी ही देर पहले प्रधानमंत्री राष्ट्र कि जनता को संबोधित कर चुके है।उल्लास और उत्साह के इस माहौल में क्या किसी ने यह सोचने की जहमत उठाई कि देश की ७०% जनता जो आज भी गाँव में रहती है और जिसका मुख्य पेशा कृषि है उसके लिए आज की इस स्वंत्रता दिवस के क्या मायने हैं।वो लोग जो खेतों में काम करते हैं वो राष्ट्र की उपलब्धिओं पर गौरवान्वित होने की बजाय अपने खेतों में काम कर रहे होंगे जिससे की शाम की रोजी-रोटी का प्रबंध हो सके।
आज जब प्रधानमंत्री देशवासिओं से राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन को सफल बनाने के लिए सहयोग की अपील कर रहे हैं वही दूसरी ओर धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर हिंसा की आग में दहक रहा है। क्या कोरा आश्वासन ही कश्मीर में अमन-चैन कायम कर सकता है।
जब प्रधानमंत्री अपने आर्थिक सुधारों और देश कि बढ़ रही आर्थिक सम्पन्नता का गुणगान कर रहे है वही दूसरी ओर नक्सलवाद से प्रभावित इलाको में नक्सली अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को सुदृढ करने के लिए आम लोगों की जाने ले रहे हैं और अपनी जाने दे रहे है।
एक तरफ जहा राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर पानी कि तरह पैसा बहाया जा रहा है वही दूसरी ओर झुग्गी-झोपड़ों में रहने वाले गरीबों और भिखारिओं को दिल्ली की सीमा के बाहर खदेड़ा जा रहा है. आखिर इस राष्ट्रमंडल के आयोजन के क्या मायने हैं जिसमें आम आदमी के हितों कि अनदेखी की जा रही हो।
स्वतंत्रता दिवस के इस अवसर पर केवल झूठी बयानबाजी की बजाय यदि देशहित में कोइ गंभीर कदम उढाया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा।आज के राजनेताओं के इस बयानबाजी पर जहीर कुरैशी का एक शेऱ है
बयानबाजी मुखर युद्ध है सियासत में,
बदलती रहती है बयान कि सीमा यहाँ।
Sahin baat hai per ye Bhrtiya loktantra ka ek pehlu hai. Kya kare!
जवाब देंहटाएंnazar ke is painepan ko yuhi banaye rakhna
जवाब देंहटाएंavinash bhai.......lage raho kabhi to wo sham aayegi..
ब्लॉग के इस विशाल सागर में गोता लगाने के लिए शुभकामनाये.........
जवाब देंहटाएंडटे रहे ... आपने कई सार्थक प्रश्नों को उठाया है जिनका जबाब हम सब को मिल कर खोजना होगा....