यह कुछ अजीब था
अब आप तय कीजिए
कि क्या अजीब था
लोकतंत्र अजीब था
या राजकुमार अजीब थे
या इन दोनों के साथ-साथ होने की
परिस्थितियां अजीब थी
जो भी हो
लेकिन वह था
अब वह था तो था
यही कि लोकतंत्र था
और राजकुमार भी थे
वे झोपड़ियों में जाते थे
और झोपड़ियां उपकृत हो जाती थीं
यह कहना तो मुश्किल था
कि आगे वे कभी जलाई नहीं जाएंगी
मगर कुछ दिनों के लिए जलने से बच ही जाती थीं
उस एक दिन अच्छा खाना बनता था
जाने कहां से एक चारपाई आ जाती थी
राजकुमार के सोने के लिए
ख़बर बनती थी
राजकुमार बांस की खटिया पर सोए
जैसे सारा देश पलंग पर सोता हो
वे दाल-रोटी खाते थे और
गरीबों को दाल-रोटी मुहाल हो जाती थी
कारों की खरीदारी बढ़ जाती थी
दालों की खरीदारी घट जाती थी
पहले यह सब खेल जैसा लगता था
विरोधी दलों और प्रतिपक्षी बुद्धिजीवियों को ही नहीं
उनकी सरकार को भी
लेकिन धीरे-धीरे सबको लगने लगा
यह खेल है
मगर खेल जैसा कोई खेल नहीं
यह तो लोकतंत्र का खेल है
जिसे बादशाहत पाने के लिए खेलना जरुरी है
भावनाओं से खेलना
सपनों से खेलना
हथियारों से खेलने से ज्यादा खतरनाक होता है
राजकुमार को सब पता था
कहां कौन सा खेल खेलना जरुरी है
अब यह अचानक तो हुआ नहीं था
कि वे लोकतंत्र के राजकुमार थे
नागरिकों के जनता और फिर
निरीह मतदाताओं मे बदल जाने
समाज के वापस समुदाय में तब्दील हो जाने
की त्रासद प्रक्रियाओं को वे जानते-बूझते थे
आखिर उनके पिता भी तो राजकुमार थे
वे जनतंत्र के पेच-ओ-खम को समझ रहे थे
एक झटके में राज हथियाने पर
दूसरे झटके से उसे खोना भी पड़ता है
इसीलिए धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहे थे
वे पक्ष भी थे और प्रतिपक्ष भी
हमारे समय के आईने में उन्हें पहचानना
हमारी भाषा के मुहावरों में उन्हें प्रकट करना
असंभव नहीं तो कठिन जरुर था
जनता अब भी उनकी सबसे बड़ी मुश्किल थी
मगर सरकार भी कम मुश्किल नहीं थी
गृहमंत्री बनैला सूअर था
जिसे भ्रम था कि वह वराहावतार है
और पृथ्वी उसके दो नुकीले दांतों पर टिकी है
वित्तमंत्री जंगली हाथी था
जिसे बुढ़ापे में कच्ची शराब की लत लग लई थी
और वह महुए की तलाश में
जंगल के वाशिंदो के घर तोड़ डालता था
डर के मारे लोगबाग पेड़ों पर रहने लगे थे
और प्रधानमंत्री
वह तो एक ‘ मेटाफर ’ था
उस लोकतंत्र में किसी भी मतदाता ने
किसी भी पद के लिए
उसे कभी भी नहीं चुना था
फिर भी वह प्रधानमंत्री था
इसीलिए वह जनता की नहीं
उन लोगों की चिंता करता था
जिनकी बदौलत वह था
लोकतंत्र इतना भर तो था ही
कि इस बात पर गहरे मतभेद थे
वह किसकी बदौलत प्रधानमंत्री था
और बहस जारी थी
अब ऐसे में राजकुमार का
सियार या लकड़बघ्घे की जगह
आदमी बने रहना कितना कठिन था
किसान गोलियां खा रहे थे
कुछ बंदूकों की
कुछ जहर की
आदिवासी भूख से बिलबिलाने
या बूट के नीचे दबकर छटपटाने की
लोकतांत्रिक नियति से बाहर आने की कोशिश कर रहे थे
एक कवयित्री जुल्मी कानून के खिलाफ
बरसों से अनशन पर बैठी थी
दिल्ली में लोग उसका नाम तक भूलने लगे थे
क्योंकि उसके पीछे कोई एनजीओ नहीं था
जो उसकी याद दिलाने के लिए
राजधानी में मणिपुरी नाच कराता
उत्तर-आधुनिक बुद्धिजीवी
अपने-अपने थूथन पर नए-नए विचार चिपकाए
इधर-उधर घूम रहे थे
कि अब कहीं कोई संघर्ष नहीं है
समाज उनके एनजीओ से ही बदलेगा
वे बाजार विरोधी विचारों से
अपना बाजार बना रहे थे
जैसे राजकुमार सरकार विरोधी विचारों से
अपना जनाधार बढ़ा रहे थे
वे चुनाव में वोट की उगाही से पहले
बार-बार तगादे पर निकलते थे
एक दिन अलीगढ़ के किसानों के बीच चले गए थे
जिन पर कुछ ही दिन पहले गोलियां बरसाई गई थीं
वहां ' नोएडा ' के कुख्यात बिल्डर को
धरने पर बैठा देख खुश हुए थे
और आदिवासियों के आंसू पोछने के लिए
नियमगिरि की ओर चल पड़े थे
उन्हें पता तो रहा ही होगा
कि उसी सूबे में उदयगिरि और खंडगिरि ही नहीं
एक धवलगिरि भी है
जहां एक सम्राट सेना के साथ गया था
और उसने क्रूरता का वह इतिहास रचा था
जिससे इतिहास बदल गया था
वैसे भी उनके भूगोल ज्ञान पर संदेह होता था
और इतिहास की तो खैर उन्हें कोई समझ ही नहीं थी
वे तो यह भी भूल चुके थे
विवाद का ताला किसने खोला था
पहली रथयात्रा किसने निकाली थी
वे जनगण की स्मृति और आकांक्षा
दोनों से खेलना जानते थे
इसीलिए उनका कद उनकी सरकार से उंचा था
हम जिस समय में थे
उसकी रत्ती-रत्ती पर उनका कब्जा था
पर वे तो उस समय को देख रहे थे
जिस समय में हम होना चाहते थे
हम सब कैदी थे
पर उतने भर से उन्हें संतोष नहीं था
वे तो हमारे सपनों को कैद करना चाहते थे
हमने पूरी दिल्ली उन्हें दे दी थी
मगर उनकी नजर तो दंतेवाड़ा पर थी
हंस के दिसंबर 2010 के अंक में प्रकाशित ‘ मदन कश्यप’ की एक कविता
जो वर्तमान भारतीय राजनीति पर कुठाराघात करती है।
bahot achchhe dost aapne prapt paristhiti par kafi gahrai se tipanni ki hai
जवाब देंहटाएंva va mere bhai.tumara dost ravi
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