अंतराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में म्यांमार(बर्मा) में आंग-सान-सू-ची की रिहाई वहां पर लोकतंत्र के स्थापित होने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है।सू-ची लगभग 15 वर्षों से अपने ही घर में नजरबंद थीं और शनिवार को उनकी नजरबंदी का आदेश वापस ले लिया गया है।गौरतलब है कि बर्मा के सर्वोच्च सैन्य शासक जुंटा पर सू-ची की रिहाई के लिए कई वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय दबाव बन रहा था और अंतत: जुंटा ने शनिवार की शाम को सू-ची की रिहाई के आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए।लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि बर्मा का सैन्य प्रशासन कमजोर पड़ रहा है, जल्दबाजी होगी।म्यांमार में सन् 1990 में लगभग 30 वर्षों के बाद स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हुए थे जिसमें आंग-सान-सू-ची के नेतृत्व वाली पार्टी नेशनल लीग विजयी हुई थी।लेकिन देश के तत्कालीन सैन्य शासन ने नेशनल लीग को सत्ता सौपने से इंकार कर दिया।तमाम विरोधों और अन्तर्राष्ट्रीय दबाव की परवाह न करते हुए सैन्य शासक जुंटा ने लोकतंत्र के समर्थकों को जेल में डलवा दिया । आंग-सान-सू-ची ने बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना करने के लिए विगत 21 वर्षों में से 15 वर्षों की जेल या नजरबंदी की यातना सही है । सू-ची अपनी बीमार माँ की देख-रेख के लिए 1988 में बर्मा वापस लौटीं और देश में लोकतंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष प्रारंभ किया । इससे क्षुब्ध होकर तत्कालीन शासन ने सू-ची को 1988 में नजरबन्द करने का आदेश दिया .
नजरबंदी के बावजूद भी सू-ची की पार्टी 1990 के आम चुनावों में भारी अंतर से विजयी रही परन्तु सैन्य शासन ने उन्हें सत्ता सौपने से इंकार कर दिया ।लोकतंत्र की स्थापना करने के प्रयासों के कारण ही सू -ची को वर्ष 1993 का शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया ।वर्ष 1995 में बर्मा की सरकार ने सू-ची की नजरबंदी हटा ली परन्तु उन्हें किसी भी राजनितिक गतिविधियों में शामिल होने से प्रतिबंधित कर दिया गया । पुनः सन् 2000 तथा 2003 में सू-ची को नजरबन्द करने का आदेश दिया गया और अंततः 13 नवम्बर 2010 को सू-ची पर से प्रतिबन्ध पूर्णत हटा लिया गया है।
आंग-सान-सू-ची की इस रिहाई को अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल हो रहा है । एकतरफ जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें अपना हीरो कहा है वहीं दूसरी ओर भारतीय विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा ने इसे लोकतंत्र की जीत कहते हुए सू-ची को बधाई दी है । अब बर्मा में यह देखना खासा दिलचस्प होगा कि 20 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद हुए चुनावों में जब वहां की जनता ने सैन्य शासन को मंजूरी दे दी है तो वहां पर लोकतंत्र का प्रारूप कैसा होगा । सू-ची की रिहाई के बाद उनके समक्ष सबसे बड़ी चुनौती सभी विपक्षियों को एकत्रित करना और विभिन्न जेलों में बंद लगभग 2200 राजनैतिक बंदियों को मुक्त कराना है।
सू-ची की इस मुहिम के बाद इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि अत्यधिक राजनितिक सक्रियता की स्थिति में सैन्य शासन उन्हें पुनः नजरबन्द न कर दे । हालाँकि अंतरराष्ट्रीय दवाब की पूर्णतया अनदेखी करना अब बर्मा के सैन्य शासन के लिए शायद ही संभव हो।

Good observation...looks like you have done a research on the topic. Well, It would be really hard for her to reunite the democratic persons against the military rule. But, as she already has shown lots of patience, she can achieve this aim as well. Overall, it was nicely written. Keep it up! :-)
जवाब देंहटाएंसूची पूरी दुनिया के लिये एक आशा की किरण हैं.............
जवाब देंहटाएंअच्छा है भाई. एैसे ही लिखते रहो..
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